आग लगी है इस दिल में
अब तूफानों से क्या डरना
मंजर वो हमने देख लिया
दहशतगर्दों से क्या डरना।
न झुके कभी न झुकना है
पैगाम यह मेरा है तुझको
दुश्मन की अब औकात नही
मिट्टी में मिलना है तुझको
प्रतिशोध की आग जो धधकी है
यह आग न अब बुझ पायेगी
दहलीज पर जाकर ही तेरे
अब मौत की बारिश बरसेगी।
सरहद पर चुपके से तुमने
आतंक का खेल जो खेला था
क्या सोच समझकर आये थे
क्या वीरों का लोहा परखा था?
कफन बांधकर निकला हूं
अब दुनिया तांडव देखेगी
मैदान-ए-जंग अब दिल में बसी
दुश्मन की औकात दफ़्न होगी
– अमर एहसास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X