..उस रात
महल की सीढ़ियाँ
कुछ कह रही थीं।
दीपक
जल तो पहले भी रहे थे,
पर
उस रात
उनकी लौ
बार-बार
महल के द्वार की ओर
झुक जाती थी।
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हवा में
चंदन की महक थी,
या
किसी की आहट—
मैं
आज तक नहीं जान पाया।
बस इतना याद है...
उस रात
समय
धीरे चलने लगा था।
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फिर...
कहीं बहुत दूर से
पायल बजी।
इतनी धीमे,
कि पहले
सन्नाटे ने उसे सुना,
फिर
मेरे दिल ने।
मैंने
उधर देखा।
और
उस एक क्षण में
जितनी दुनिया देखी थी,
सब छोटी पड़ गई।
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वह चली आ रही थी...
जैसे
चाँद ने
धरती पर उतरने के लिए
एक स्त्री का रूप
चुन लिया हो।
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उसकी आँखें...
नदी नहीं थीं।
न समंदर।
वे तो
ऐसी जगह थीं,
जहाँ
हर भटका हुआ मन
घर लौटना चाहता था।
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लोग
उसके रूप की बातें करते रहे।
मैं
उसकी ख़ामोशी में
उम्र भर
खोया रहा।
वह
बहुत कम बोली।
पर
उसकी हर चुप्पी
मेरे भीतर
एक नया गीत
लिख जाती थी।
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एक शाम
उसने
बस इतना पूछा—
"थक गए हो?"
मैं मुस्कुरा दिया।
क्योंकि
जिस स्त्री को
तुम्हारी थकान
दिख जाए,
उससे बड़ा प्रेम
दुनिया में
कहाँ होता है?
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उस दिन
उसने
मेरा हाथ नहीं थामा।
सिर्फ़
अपनी उँगलियाँ
मेरी हथेली पर
एक पल के लिए
ठहरने दीं।
और मैं...
जो
तलवारों के बीच
कभी नहीं काँपा,
उस एक स्पर्श से
हार गया।
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आज
लोग मुझसे पूछते हैं—
"क्या वह सचमुच
इतनी सुंदर थी?"
मैं
हर बार
मुस्कुरा देता हूँ।
---
क्योंकि
जिसे
सिर्फ़ आँखों से देखा जाए,
वह सुंदर हो सकती है।
पर
जिसे
आँखें बंद करके भी
भुलाया न जा सके—
वह...
प्रेम होती है।
---
और
कुछ प्रेम
नाम नहीं पूछते।
वे
बस
एक रात आते हैं...
और
उम्र भर
दिल में
दीपक जलाए रखते हैं।
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