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सुनाने की चाह

                
                                                         
                            बचपन में जो बात थी, दिल में रह जाती।
                                                                 
                            
किसे सुनाऊँ सोचकर, चुप्पी रह जाती।।

माँ की गोदी थी कभी, मन का एक खजाना।
जो भी कहना होता तब, उसको था सुनाना।।

धीरे-धीरे उम्र बढ़ी, बातें भी बदलें।
मन के भीतर घाव कई, खुद ही सबको झेलें।।

कभी दोस्त की पीठ पर, दिल रख रोया था।
पर उसने भी हँसकर बस, उल्टा ही बोला था।।

अब जो कहने को बहुत, पर सुनने वाला कौन?
भीड़ भरी इस दुनिया में, हर कोई है मौन।।

तुमसे कहना चाहा कुछ, तुमको नहीं फुरसत।
शब्द अधूरे गिरते अब, जीवन की सरहद।।

चाहा था इक कान मिले, जो दिल की सुन पाए,
पर हर कोई बोल रहा, कोई नहीं सुन पाए।।

अब तो मैं ही रोज़ खुद से, बातें कर लेता।
आईना ही मित्र बना, उसको सब सुन लेता।।
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एक वर्ष पहले

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