संस्कार वो दीपक हैं, जो भीतर उजास भरें,
पथ अंधेरों में भी जीवन के, वो रौशनी करें।
ना केवल शब्दों में, ना सिर्फ़ दिखावे में,
संस्कार झलकते हैं हर छोटे बर्ताव में।
माँ की गोद से शुरू हो ये शिक्षा की बात,
पिता की डाँट में छुपा हो प्रेम का जज़्बात।
दादा-दादी की कहानियों में छुपा हो मान,
हर पीढ़ी दे अगली को अपना सत्-विवेकदान।
संस्कार सिखाते हैं झुकना भी समय पर,
ना टूटना किसी से, ना बनना अहंकार पर।
"तू" और "मैं" के बीच जो "हम" बनाना जानें,
वो ही सच्चे संस्कार हैं जो इंसान को पहचानें।
ना ऊँच-नीच, ना भेदभाव, ना भाषा का गर्व,
जो अपनत्व दे सबको, वही हो सबसे श्रेष्ठ कर्म।
धन-दौलत मिट जाए, पर संस्कार रह जाएँ,
इन्हीं से तो जीवन में मूल्य सजे आएँ।
चलो आज फिर थाली में भावों की रोटी परोसें,
संस्कार की सब्ज़ी से बच्चों को रोज़ सिखाएँ।
ये मंदिर, मस्जिद बाद में आएँ,
पहले दिल में इंसानियत का दीप जलाएँ।
-अमन केशरी सिंह
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