ना ज़रूरत ज़ेवरों की, ना किसी ताज की बात हो,
बस दिल में हो उजियारा, वही सबसे खास हो।
ना हो मन में वैर कोई, ना घृणा का बोझ हो,
परवरिश दिल की हो ऐसी, जैसे प्रेम रोज़ हो।
कठिन राहों में भी जो मुस्कुरा सके सदा,
हर जख्म पे मरहम रखे, बने प्यार की दवा।
ना हो छल, ना हो दंभ, ना हो स्वार्थ की हवा,
दिल बड़ा हो इतना कि समा जाए हर दुआ।
माँ की ममता, पिता का संबल,
भाई की रक्षा, बहन का अंचल।
हर रिश्ते की भीनी-भीनी सी गंध बसी हो,
दिल की परवरिश में यही बंदगी हो।
झुक जाए जो अपनों के लिए हर बार,
पर अपने आत्मसम्मान का भी रखे ख्याल।
ना टूटे मुश्किलों में, ना फूल सा बिखर जाए,
दिल की परवरिश ऐसी हो जो पत्थर को भी प्यार सिखाए।
-अमन केशरी सिंह
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