साहब, यूं ही कोई नहीं चाहता पैदल चलना,
मजबूर हूं, मैं मज़दूर हूं।
आया शहर तुझे बनाने,
ख़ुद के सपने साकार करने।
इमारतें तुझे अपने इसी हाथों से बनाया,
ऐ शहर तू मुझे चंद दिन भी नहीं रख पाया,
आया था एक उम्मीद लेकर
कि कर सकूं कुछ अपने लिए, कुछ अपनों के लिए,
किंतु आज बस एक ही है आस,
रहते हुए सांस पहुंच सकूं अपने गांव,
अपनों के पास,
साहब, यूं ही कोई नहीं चाहता पैदल चलना,
मजबूर हूं, मैं मज़दूर हूं।।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X