लोकतंत्र की छाँव में, सपना सबका बुनता है।
जन-जन की आवाज़ से, स्वर उसका गूँजता है।।
लेकिन जब स्वार्थ के बादल, आकाश को ढक लेते हैं।
सच्चाई के दीपक भी, डर से बुझने लगते हैं।।
कुर्सियों की भूख अगर, न्याय को निगलने लगे,
भ्रम की आँधी सच का, चेहरा धुंधला करने लगे।।
तब सवाल उठता है , क्या यही है जनता की राह?
क्या केवल चुनाव ही है, लोकतंत्र की परिभाषा मात्र?
लोकतंत्र नहीं सिर्फ़, मतों का आंकड़ा होता है,
यह तो विश्वास है, जो जनता में जीता है।
संवाद हो, स्वतंत्रता हो, आलोचना का हक़ रहे,
तभी लोकतंत्र की जड़ें, सदियों तक दृढ़ रहें।
इसलिए डरने का नहीं, जागने का समय है,
लोकतंत्र को बचाना, हर नागरिक का कर्तव्य है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X