जो कहते हैं राजपूत अब कुछ प्रतिशत बचे हैं,
कभी पूछो इतिहास से कि वो कैसे घटे हैं।
न म्यान में तलवार रही, न हृदय में भय था,
हर मोर्चे पर खड़ा एक क्षत्रिय अडिग महान था।
जहाँ धर्म संकट में आया, वहाँ वे ढाल बने,
जननी, जन्मभूमि के लिए, बलिदानों में ढले।
रणभूमि में लहू बहा, पर पीठ नहीं दिखाई,
मृत्यु को वरण किया, पर हार कभी न आई।
राणा हो या पृथ्वीराज, सिसोदिया की ललकार,
एक-एक वीर की गाथा करती अमर पुकार।
चित्तौड़ की जौहर ज्वालाएँ गवाही देती हैं,
क्यों क्षत्राणियाँ भी शमशीर उठाने चलती हैं।
केसरिया बाना लहराया हर रण के वीरों ने,
प्राण दे दिए, पर झुकाया नहीं शीश धीरों ने।
भाले-तलवारें, अश्वारोही गरजते थे जब,
शत्रु दलों की रूह काँपती थी तब।
राजपूतों ने लड़कर हार को भी शौर्य दिया,
मिट गए मगर कभी नाम को कलंक न किया।
जो आबादी अब कम है, वो कायरता की निशानी नहीं,
बलिदानों की श्रृंखला है, ये कोई कहानी नहीं।
जो सदा दूसरों के लिए जिए, मरना चुना,
अपनों को बचाने में खुद को खपाना चुना।
जब-जब देश संकट में था, रणबांकुरे बढ़े,
धधकते अंगारों पर भी राजपूत डटे।
सिंहों की तरह दहाड़े, दुश्मन काँपे सब,
प्राण दे दिए, पर खोया नहीं आत्मगौरव।
छोटे हुए हैं संख्या में, पर बड़े हैं स्वाभिमान से,
पूछ लो इतिहास को, नहीं डरते किसी तूफान से।
रक्त की हर बूँद में, माँ भारती का मान है,
राजपूतों का जीवन बलिदान की पहचान है।
जो बचे हैं आज, वो भी रक्षक बनकर जीते हैं,
मिट गए कई, ताकि लाखों चैन से जीते हैं।
गिनती में मत तोलो, हौसलों का मोल नहीं,
राजपूतों का इतिहास पढ़ो, वह कोई झूठा बोल नहीं।
नमन उन वीरों को, जिनसे भारत महान है,
कमी नहीं, यह गर्व है – यह क्षत्रिय पहचान है।
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