अधर्म चढ़ा जब राजपथ, सत्य हुआ निर्वासित।
सभा बनी श्मशान तब, विवेक हुआ उपहासित॥
मौन रहे जो धर्म पर, वे भी दोषी ठहराए गए।
अन्याय सहना पाप है, श्रीकृष्ण यह बतला गए॥
रण बोला, रण ही उत्तर, शांति व्यर्थ का विलास।
धर्म वहीं है जहाँ हो, अन्याय से सीधा टकराव॥
जब अधर्म ने धर्म की, छाती पर रख दिया पाँव,
राजसभा में बिक रहा, मर्यादा का हर घाव।
भीष्म की चुप्पी चीख बनी, द्रोण का मौन अपराध,
एक स्त्री के अपमान ने, जला दिया कुल का अभिमान।
कृष्ण गरजे अब शांति नहीं, यह युग रण का द्वार ,
जो अन्याय के साथ खड़ा, वही सबसे बड़ा गद्दार ।
सत्ता के चरणों में गिरकर, दाँव लगे हैं फैसलों पर।
कर्तव्य रोज़ नीलाम हुए, चुप्पी के सौदे पैसों पर।
जो बोले, वह देशद्रोही, जो चुप, वही सम्मानित,
भीड़ बनी है कौरव-सी, विवेक पड़ा है अपमानित।
कृष्ण आज भी पूछ रहे, कब टूटेगा यह भ्रमजाल?
धर्म वहीं है, जहाँ खड़ा हो, अन्याय से सीधा सवाल?
-अमन केशरी सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X