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जिंदगी किसी की ना ग़मों से स्याह हो

                
                                                         
                            ना हमें किसी से कुछ पाने की चाह हो
                                                                 
                            
दुनियां से बहुत ही अलग अपनी तो राह हो

पूछे तो जाके रुक्मणी से प्रश्न ये कोई
आधे अधूरे कृष्ण से कैसे निबाह हो

लोग शहंशाह के दरबार में जायें
हमें तो नाखुदा की पावन पनाह हो

माह के आखीर में हाथ ना फैलाये
फकत इतनी आदमी की तनख्वाह हो

बसर रब की हर जगह यह मान ले
क्यों किसी से फिर कोई गुनाह हो

खुशी की रोशनी सभी के दामनों में हो
जिंदगी किसी की ना ग़मों से स्याह हो

नापना आ गया आलोक नयन को
कितनी भी गहरी उल्फतों की थाह हो
-आलोक
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50 मिनट पहले

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