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भूख की रणभूमि

                
                                                         
                            भूख ही रणभूमि की पहली और सबसे भीषण तलवार है,
                                                                 
                            
जो इस पर जीत गया, वही जीवन का असली सरदार है।
जिसने जिह्वा की ज्वाला को संयम के जल से शांत किया,
उसने अपने भीतर छिपे परम पुरुषार्थ को जागृत किया।

भूख केवल अन्न की नहीं, इच्छाओं की भी होती है,
यही मन में काम, क्रोध, लोभ की अग्नि संजोती है।
जिह्वा यदि विषयों की दासी बनकर प्रतिक्षण दौड़ेगी,
तो आत्मा की दिव्य चेतना कब तक मौन पड़ेगी?

जो भूख के वेग में भी धैर्य का दीप जलाता है,
वही अपने अंतर्मन का सम्राट कहलाता है।
उसके सम्मुख काम स्वयं संन्यासी बन जाता है,
क्रोध हथियार डाल देता, लोभ शीश झुकाता है।

मोह के बंधन टूट पड़ते, मद का मुकुट बिखर जाता,
मत्सर का विषधर भी उसके चरणों में मर जाता।
संयम जिसकी ढाल बने, विवेक जिसकी तलवार हो,
उसके जीवन का प्रत्येक श्वास ईश्वर का उपहार हो।

आलोक! पहले जिह्वा के सिंहासन से लालसा उतार,
फिर देख, तेरे भीतर जागेगा आत्मबल अपार।
जो भूख पर विजय पा लेता है, वही सच्चा विजेता कहलाता है,
उसके चरणों में काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ और मोह स्वयं नतमस्तक हो जाते हैं।

-आलोक पांडेय
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3 महीने पहले

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