एक बचपन गाँव का नीम की छाँव का ।
मिट्टी में धूल में खेलते नंगे बदन नंगे पाँव का।
स्कूल को जाना भी और स्कूल से आना भी।
तरबूजे के खेत से खरबूजे को चुराना भी।
गौरी गाय के भूरे बछड़े से,
चितकब्री बकरी के छोटे मेमने से
फुदकते कूदते दौड़ लगाते हैं।
पेड़ पर चढ़ते भी हैं
आपस में लड़ते भी हैं
कट्टी बट्टी करके फिर मिल जाते हैं।
गुल्ली डंडा खेलते हैं
और कंचे भी चटकाते हैं।
कोयल की कूक में स्पर्धा छेड़ जाते हैं।
धूप खिली है हवा खुली है।
पीपल की छाँव में थककर लेट जाते हैं।
यूूँ तो शहर में पिज्जा भी है बर्गर भी है,
पर दूध मिस्सी रोटी के गुण कहाँ पाते हैं।
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