आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तेरे नाम पर लानत हो

                
                                                         
                            तुमसे मुलाकात के उस साल पर लानत हो।।।
                                                                 
                            
तेरे लिए जो आया था उस ख्याल पर लानत हो

जिस नाम से थी मुझको मोहब्बत बेशुमार
उस नाम पर लानत हो तेरे नाम पर लानत हो

तेरी यादें लेकर आती थी जो ख्वाब मुझे दिखाती थी
हर उस शाम पर लानत हो तेरे नाम पर लानत हो

वो भूल जो हुई थी कि तुम मेरी अमानत हो...
उस भूल पर लानत हो उस भूल पर लानत हो

जो दर्द पिया मैंने वो तुमने दिया था
उस दर्द के एक-एक घूंट पर लानत हो

तू है ही नहीं सच तू झूठ का पुतला था
तेरी झूठ पर लानत हो मनहूस पर लानत हो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर