शांत स्वभाव ,
विशाल तन।
कोलाहल विरक्त ,
करता हूँ शयन।
विटप देते,
शीतल छाया।
पवन डुलाता ,
अविरल पंखा।
कद मेरा लम्बा ,
लम्बाई मेरी शोभा।
तन मेरा चिकना ,
कही कहीं खुरदरा।
पथिक हमें देखता ,
मन में मुस्कराता।
सानिध्य के लिए ,
दौड़ता मेरे साथ।
भले ही हो वाहन ,
उसके हाथ।
मेरे सानिध्य में ,
प्रसन्न रहता वह।
गंतव्य पर पहुँच ,
तारीफ करता वह।
न देखता हूँ निर्धन ,
न देखता धनवाला।
न देखता हूँ गोरा ,
न देखता हूँ काला।
न पूंछता हूँ जाति ,
न देखता हूँ माला।
मैं हूँ भेद भाव रहित ,
राजपथ दिलवाला।
- अशर्फी लाल मिश्र ,कानपुर देहात
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