आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

निज गृह की ओर

                
                                                         
                            गए थे अपना घर छोड़कर,
                                                                 
                            
उदर की भूख मिटाने के लिए।
आज वही विवश हो रहे,
वापस घर आने के लिए।।

जीवन का अवसान जान,
उन्मुख निज गृह की ओर।
विवश हो रहे हैं आज,
वापस घर आने के लिए।।

सिर पर है पोटली,
साथ में संगिनी।
आँखें अश्रु पूरित,
वापस घर आने के लिए।।

भूख से व्याकुल,
पैरों में पड़े हैं छाले।
कभी आँखें प्रिया की ओर,
वापस घर आने के लिए।।

-Asharfi Lal Mishra,
Akbarpur,Kanpur

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर