धरती प्यासी जान के ,जलघर पहुंचे धाय।
जलधर बरसे झूम के ,धरा मगन हो जाय।।1।।
जलधर देखे गगन में, केकी हर्षित होय।
जलधर बरसे झूम के, कृषक मगन हो जाय।।2।।
प्रेम धरा का मेघ से, विधि ने दिया बनाय।
जब भी भू व्याकुल दिखे, घन गरजे हरसाय।।3।।
-अशर्फी लाल मिश्र,
कानपुर
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