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नीति के दोहे मुक्तक

                
                                                         
                            निः स्पृह
                                                                 
                            

अधिकार पाकर कोई, निः स्पृह कैसे कोय।
जिमि श्रृंगार प्रेमी नर, अकाम नाही होय।।1।।

द्वेष

मूरख द्वेष सदा बुध सो, रंक धनी से मान।
परांगना कुलीना सो, विधवा सधवा जान।।2।।

रक्षण

धन से रक्षित धर्म होय, योग से रक्षित ज्ञान।
भली नारि से घर रक्षित, मृदुता से श्रीमान।।3।।



--अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
 
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4 वर्ष पहले

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