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नीति के दोहे मुक्तक

                
                                                         
                            मानवता
                                                                 
                            

धन बल जन बल होइ जब , सब दुर्गुण छिप जाय।
ऐसे बली के सम्मुख, मानवता शरमाय।।


धन की होड़ चहुँ ओर , नीति अनीति न जान।
ऐसे धन संग्रह से , कबहुँ न हो कल्यान।।


लूट मची बाजार में , जो चाहे सो लूट।
घटिया माल बजार में , मिले छूट पर छूट।।

Poet : Asharfi Lal Mishra, Akbarpur, Kanpur.


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6 वर्ष पहले

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