फागुन में खिले टेसू के फूल।
फूलों में सुन्दर टेसू के फूल।।
फागुन की हवा अकड़ते अंग।
सबको चढ़ता होली का रंग।।
दादी थिरक रहीं अंगना में।
दादा मारें रंग पिचकारी।।
बिटवा ढोल बजाय रहे।
बहुवें थिरकें दे तारी।।
पोता पोती रंग उड़ायें।
उछलें दै दै तारी।।
घर-घर बाजे ढोल मजीरा।
घर-घर उत्सव भारी ।।
अशर्फी लाल मिश्र
कानपुर देहात
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