मुनि सतानंद की अनुमति पाय,
धीरे धीरे चल पड़ी जनक लली।
अनुगामी हो गईं थीं संग सहेली,
पिय छवि अँखियन जनक लली।।
अब पहुँच गईं थी जनक सुता,
जँह मंच खड़े राघव राम बली।
मन में कर रही सबहिं प्रणाम,
आशिष माँग रही जनक लली।।
पलक उठाय भरि नैननि छवि,
गले जयमाल डाली राम बली।
करतल ध्वनि अब गूँजी सभा,
तभी गगन पुष्प वर्षा होने लगी।।
महर्षि विश्वामित्र की अनुमति से,
मिथिला राजन भेजा साकेत दूत।
खुशी फैल गईं सिगरी अयोध्या,
जब वरात आमंत्रण लाया दूत।।
राजा दशरथ थे अति प्रफुल्लित,
अनुमति माँग रहे कुल गुरु से।
राजा मिथिला ने लिखा पत्र में,
राजन वरात लइयो दल बल से।।
-अशर्फी लाल मिश्र
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