गुरु कृपा से अब राघव राम,
उठा लिया धनु दोनों कर से।
खुशी फैल गईं सिगरी सभा,
करतल ध्वनि हो रही सभा।।
जनक लली इक टक देखै,
जब धनुष उठा दोनों कर से।
थीं सखियाँ पास जनक लली,
करें ठिठोली जनक लली से ।।
एक सखी कह रही सखी से,
जनक लली कर्पूर सी गौर।
राम दिख रहे कुछ काले काले,
दूजी सखी राम केश घुँघराले।।
सखियन बीच कह रही सखी,
चाँद सा मुखड़ा जनक लली।
जनक लली भी अब देख रही,
तिरछे नयनन अब राम बली।
अब प्रण पूरा होये पितु का,
शिव आराधै जनक लली।
अब राम पिनाक संधान करें,
अधीर हो रही थी जनक लली।।
-अशर्फी लाल मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X