याहियावंशी यदुवंशी के,
सौ थे राजा जयध्वज पूत.
कुछ राम भय से थे भागे,
पहुँचे भोज, अवन्ति पूत।।
जहाँ जहाँ थे अर्जुन वंशी,
बढ़ रहे थे उनके अत्याचार।
ढूंढ़ ढूंढ़ ऋषियों मुनियों पर,
कर रहे थे राक्षसी व्यवहार।।
वृह्मर्षि राजर्षि सभी दुखी,
व्यवहार अर्जुन वंशज से।
तभी राम ने लिया संकल्प,
क्यों न मिटा दूँ शीघ्र धरा से।।
अब पवन वेगहिं चले राम,
शोभित जिनके परशु हाथ।
ढूंढ़ ढूंढ़ कर याहिया वंशी,
सिर कटे पड़े थे धरा अनाथ।।
अर्जुन सहयोगी क्षत्रिय भी,
सिर विहीन थे भू पर आज।
क्षत्रिय अत्याचारी अहंकारी,
सभी भू पर पड़े थे आज ।।
-अशर्फी लाल मिश्र
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