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भार्गव राम खण्डकाव्य - 35

                
                                                         
                            राजा जयध्वज अर्जुन पूत,
                                                                 
                            
सभी भ्रात अरु सेना साथ।
सम्मुख खड़े जमदग्नि पूत,
था परशु अस्त्र उनके हाथ।।

क्यों न जयध्वज वंश मिटाऊँ,
अरु सिगरी सेना आज अभी।
कहकर राम ने परशु चलाया,
काट दिया राजहि शीश तभी।।

दौड़ दौड़ कर जमदग्नि राम,
विद्युदभि परशु काटहिं शीश।
खीरा सम कटे थे भूमि सैनिक,
ढेर थे लाशों के शीश पर शीश।।

सिगरी नगरी में ढूंढ़ ढूंढ़,
हैहय वंशी क्षत्रिय किये बध।
राज वंश था अब नर विहीन,
किसी अबला को छुआ नहीं।।

दहशत फैल गईं सिगरी नगरी,
अबलायें अब कर रही रुदन।
छाया मातम अब राज महल,
रानियाँ कर रही सब क्रन्दन।।
-अशर्फी लाल मिश्र
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3 महीने पहले

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