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अश्रुधारा मुक्तक

                
                                                         
                            बिदाई के पहले जो भरे थे नयन,
                                                                 
                            
बिदाई समय अश्रुधारा बनने लगी।
मानो हिमालय पिघलने लगा,
या गंगा-यमुना के संगम की धारा बहने लगी।।

जो भी धारा के सम्मुख आया,
वह बहता ही गया ,बहता ही गया।
धारा में माता आगे रहीं,
सो बहती रहीं , सो बहती रहीं।।

धारा में पिता भी बहे,
तो बहते ही गये ,
बहते ही गये।
भ्राता भी बिन बहे न रहा ,

भगिनी भी बही,
वह ऐसी बही।
वह तो फूट ही पड़ी ,
बहना हम को क्यों तुम छोड़ चलीं।

सहेलियाँ भी बिन बहे न रहीं,
वे भी धारा में बहती गईं।
जो भी पड़ा धारा के सम्मुख,
सब के दिल का मलवा बहाती गई।।

साथ में केवल अश्रु की धारा ,
उसमें सभी को डुबोती गई।
पिता के घर को रोशन कर ,
प्रियतम के घर को चली गई।

--अशर्फी लाल मिश्र , कानपुर देहात



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7 वर्ष पहले

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