मैं बड़ी हो गई, पापा...
अब आपकी हिम्मत बनना चाहती हूँ।
जिस उँगली को पकड़कर चलना सीखा था,
अब उसी हाथ का सहारा बनना चाहती हूँ।
जब मैं छोटी थी,
आपने हर डर मुझसे पहले अपना लिया।
मेरी एक मुस्कान के लिए,
अपने हर दर्द को चुपचाप जी लिया।
आज वक़्त ने करवट बदली है,
ज़िम्मेदारियों ने मुझे भी समझदार बना दिया।
अब आपकी आँखों की थकान पढ़ लेती हूँ,
आपकी ख़ामोशी का मतलब समझ लेती हूँ।
मैं बड़ी हो गई हूँ, पापा...
अब हर मुश्किल में आपके साथ खड़ी रहूँगी।
जिस तरह आपने मेरा हौसला बनकर
हर गिरावट में मुझे संभाला,
वैसे ही अब मैं आपकी हिम्मत बनूँगी।
आपने मेरे सपनों को पंख दिए,
अब मैं आपकी उम्मीदों की उड़ान बनना चाहती हूँ।
आपके चेहरे की मुस्कान,
मेरी सबसे बड़ी पहचान बनना चाहती हूँ।
बस एक वादा है, पापा—
आप कभी खुद को अकेला मत समझिए।
अब आपकी बेटी बड़ी हो गई है,
और हर हाल में आपकी ताक़त बनकर साथ चलेगी।
-अक्षि त्यागी
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