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ये कहो तुम्हारे बस की नहीं मुहब्बत

                
                                                         
                            दूर से तो हैं नज़ारे सुहाने हर जगह के
                                                                 
                            
मसले मग़र हैं वही पुराने हर जगह के

चूर कर देगी इधर से उधर की हिज्रत
एक से हैं अनाज के दाने हर जगह के

ये कहो तुम्हारे बस की नहीं मुहब्बत
जुनूनी हैं वरना तो दीवाने हर जगह के

दश्त ना सही एक पेड़ तो लगाया है हमने
वरना बंजर ही रहे वीराने हर जगह के

कहाँ से फिट बैठेंगे इश्क़ के रोशनी धागे
सूती हैं समाझी ताने बाने हर जगह के

श्वेत खुद को दूसरे को स्याह कहने वाले
राज़ डुबकाए फिरते हैं घराने हर जगह के
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एक घंटा पहले

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