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मौत की दुआ

                
                                                         
                            जो मेरी मौत की दुआ
                                                                 
                            
और बद्दुआ करते रहे,
अपने ही ज़ख़्मों को मगर
हर पल हवा करते रहे।

लार से कुत्ते के भरते हैं,
ज़ख़्म उसी के जिस्म पर।
इंसाँ के भरते अगर,
हर कुत्ता हकीम होता।

मेरी मौत की दुआ से क्या,
मुक़द्दर बदल सकोगे तुम।
क़ज़ा का तो फ़ैसला होता,
इंसाँ की दुआओँ से नहीं।

कैसा आख़िर वो तअल्लुक़,
कैसी वो ख़ुदगर्ज़ियाँ,
दुआ में भी अपने लिए
अपना हिस्सा जोड़ते रहे।

जिसने अपनी रूह तक
अपनों पे क़ुर्बाँ कर दी थी,
उसके ही हिस्से मगर
इल्ज़ाम सारे धरते रहे।

हक़ था मेरा, इसलिए बस
थोड़ा-सा अपनापन माँगा,
तुम मगर कुचक्रों की ही
हर रोज़ कुचक्र बुनते रहे।

घर उजाड़ा, दिल जलाया,
चैन भी छीना मेरा,
फिर मेरी मौत की दुआ
हाथ उठा करते रहे।

‘अनपढ़’ इतना जान ले,
सच बिके बाज़ार में नहीं।
झूठे और मक्कार बस,
मौत की दुआ करते रहे।
-अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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