साठ कहे अब सौंप दे, जिनको दी थी छाँव।
अपना आँगन छोड़ मत, छोड़ ‘मेरा’ का भाव॥
वन जाना वनप्रस्थ नहीं, मन का वन चुन लेय।
घर में रहकर मोह तज, अपने भीतर देख॥
जो पाया सो बाँट दे, जो खोया सो भूल।
मन में गाँठ न बाँधिए, जीवन बहता कूल॥
सत्तर में इच्छा घटे, मन का लोभ समाय।
जितना कम चाहे मनुज, उतना सुख बढ़ जाय॥
वृद्ध वृक्ष-सा हो रहो, फल की इच्छा त्याग।
छाया देना धर्म हो, यही बुढ़ापे भाग॥
नब्बे की चौखट कहे, पद-प्रतिष्ठा व्यर्थ।
स्मृति रहे तो धन यही, अनुभव जीवन-अर्थ॥
सबके बीच रहो मगर, मन पर रहे न भार।
प्रेम करो निष्काम हो, यही मुक्ति का द्वार॥
सौ की देहरी पर खड़ा, क्या अपना क्या गैर।
‘मैं-मेरा’ जब मिट गया, मन हो गया कबीर॥
जो आया वह जाएगा, यही जगत का सार।
‘अनपढ़’ खाली हाथ चल, प्रेम रहे संसार॥
— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
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