कहते हैं, हर युग की अपनी पहचान होती है।
कभी शेरों का ज़माना था, कभी घोड़ों का।
अब इतिहास ने नया अध्याय लिख दिया है—
गधों का ज़माना है, हुज़ूर!
आज सिर झुकाकर चलने वाले घोड़े
अस्तबल में घास चबा रहे हैं और
दुलत्ती मारने वाले ऊँची मसनदों पर विराजमान हैं।
योग्यता अब प्रमाणपत्र में अच्छी लगती है;
सफलता के लिए कुछ और ही गुण चाहिए।
वैसे गधे के दिन सचमुच फिर गए हैं।
जिसे कभी मूर्खता का प्रतीक माना जाता था,
वही आज करोड़ों के कारोबार का आधार बन बैठा है।
पश्चिमी राज्य ने साबित कर दिया कि
सही सोच मिले तो गधा भी
अर्थव्यवस्था का सितारा बन सकता है।
सौंदर्य-जगत तो पहले से ही उसका ऋणी है।
इतिहास बताता है कि
मिस्र की महारानी क्लियोपेट्रा
गर्दभी के दूध से स्नान करती थीं।
आज विज्ञान भी मान रहा है कि
इसमें ऐसे पोषक तत्व हैं
जो त्वचा और स्वास्थ्य,
दोनों के लिए लाभकारी हैं।
आधुनिक कॉस्मेटिक उद्योग
जिन दावों पर अरबों खर्च करता है,
उनमें से कई काम यह दूध सदियों पहले
बिना विज्ञापन के कर चुका था।
आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में
इसकी ऐसी माँग है कि दूध लीटर नहीं,
कपों में बिकता है।
नवजात शिशुओं के पोषण से लेकर
औषधीय उपयोग तक इसकी चर्चा है,
और कीमत सुनकर गाय-भैंस भी
शायद आत्ममंथन करने लगें।
उधर राजनीति ने भी
प्रकृति से बहुत कुछ सीख लिया है।
अब दौड़ जीतने के लिए घोड़े जैसी रफ़्तार नहीं,
गधे जैसी सहनशक्ति और समय पर
दुलत्ती चलाने की कला ज़्यादा काम आती है।
विचारधारा अब लगाम की तरह है—
ज़रूरत हो तो पहन लो,
मंज़िल मिलते ही उतार दो।
हुनरमंद अब भी मेहनत कर रहे हैं,
लेकिन बाज़ार किसी और की ब्रांडिंग में व्यस्त है।
शराफ़त कोने में दुबकी है, अक़्ल सकुचाई हुई है,
और सफलता मुस्कराकर पूछ रही है
अभी भी सिद्धांतों पर अड़े हो?”
इसलिए अगली बार कोई
आपको गधा कह दे
तो बुरा मत मानिए।
पहले यह देख लीजिए कि
वह आपका अपमान कर रहा है
या उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणी।
क्योंकि, हुज़ूर…
आजकल गधे नहीं,
गधापन सबसे तेज़ तरक्की कर रहा है।
— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X