मियाँ-बीबी दोनों ही, खूब कमाते आज,
तीस-तीस का पैकेज है, ऊँचा ठाठ-समाज।
सुबह काम पर जाएँ दोनों, शाम लौट घर आएँ,
मेहनत करके अपने घर को सुंदर खूब बनाएँ।
घर में माता-पिता भी, बच्चों की किलकार,
दादा-दादी की छाँव में हँसता था परिवार।
नाना-नानी, मामा-मौसी, चाचा-बुआ का प्यार,
रिश्तों की खुशबू से महका रहता घर-संसार।
दादी की कहानी सुनकर बच्चा सोता रात,
दादा की उँगली पकड़कर करता मन की बात।
माँ के हाथ की रोटियाँ, नानी का अचार,
छोटी-छोटी चीज़ों में था खुशियों का संसार।
होली के रंगों में रंगता, दीप जले त्योहार,
राखी पर बहना मिलती, मिलता बुआ का प्यार।
बड़ों के पाँव छूकर पाया आशीष अपार,
संस्कारों की छाँव में बढ़ता गया कुमार।
माँ कहती—“बेटा सदा रखना इतना ध्यान,
धन से बढ़कर जगत में होता है सम्मान।”
पिता सिखाते—“मेहनत करना, रखना ऊँचा नाम,
लेकिन अपनों को भुलाकर मत करना कोई काम।”
समय चला, बच्चा बढ़ा, पहुँचा अच्छे स्कूल,
पढ़ने में होशियार था, संस्कारों में फूल।
स्कूल गया, कॉलेज गया, पाया खूब मुकाम,
माँ-बाप की आँखों में था बेटे का ही नाम।
मेहनत उसकी रंग लाई, अवसर मिला अपार,
उच्च पढ़ाई के लिए जाना था उस पार।
घर में खुशियाँ भी बहुत, आँखों में था नीर,
पंख मिले थे लाल को, पर काँपा माँ का धीर।
माँ ने लड्डू बाँध दिए, पिता ने रखा हाथ,
दादी बोली—“फोन करना, खाना खाना साथ।”
दादा बोले—“खूब बढ़ो, छू लेना आकाश,
लेकिन अपनी जड़ का रखना हरदम ही अहसास।”
बेटा झुककर पाँव छुए, सबने दिया दुलार,
किसे पता था यहीं से बदल रहा संसार!
पहले-पहले फोन पर होती लंबी-लंबी बात,
“माँ, तुम्हारी दाल की आती याद मुझे हर रात।”
फिर पढ़ाई, फिर नौकरी, बढ़ता गया दबाव,
नई जगह की जिंदगी ने बदले धीरे भाव।
पहले फोन हुआ प्रतिदिन, फिर सप्ताह में एक,
“मॉम, अभी कुछ बिज़ी हूँ”—उत्तर मिलता नेक।
दादी पूछे—“कब आएगा?” माँ कहती—“इस साल”,
साल गुजरते ही गए, आता रहा सवाल।
पढ़ते-पढ़ते काम मिला, डॉलर की तनख्वाह,
वहीं मिली हमसफ़र और वहीं बनी फिर राह।
जिसे लौटना था घर कभी, वहीं बसाया घर,
माँ-बाप देखते रह गए सात समंदर उधर।
बेटा एडिलेड में बसा, बेटी न्यूयॉर्क,
ब्राइट बच्चों के वास्ते बुढ़ापा हुआ डार्क।
डॉलर में भविष्य बँधा, सात समंदर पार,
माँ-बाप के हिस्से बचा ऑनलाइन ही प्यार।
“मॉम, दवाई टाइम पर लेना, डैड रखना ध्यान,”
इतना कहकर कॉल कटा—मीटिंग थी श्रीमान!
माँ ने पूजा में रखा अब भी बेटे का नाम,
पिता पुराने एलबम में ढूँढ़ें बीती शाम।
समय चला अपनी तरह, बदल गया संसार,
घुटने थकने लग गए, आँखों पर चश्मा भार।
घर में पैसा खूब था, सुविधा का अंबार,
लेकिन शामें पूछतीं—“कहाँ गया परिवार?”
बेटे का कमरा आज भी वैसा ही तैयार,
बस कमरे का मालिक रहता सात समंदर पार।
बेटा डॉलर में बँधा, सात समंदर पार,
चिता उठाने बाप की आए पड़ोसी चार।
जिसने उँगली थामकर चलना उसे सिखाया,
अंत समय उस हाथ ने बेटे को पास न पाया।
ऑनलाइन पर हो गए सारे लाड़-दुलार,
दुनिया छोटी हो गई, दूर हुए परिवार।
साधन इतने बढ़ गए, घटता गया संवाद,
सुविधाओं के शोर में दब गया मन का नाद।
बच्चे उड़ें आकाश में, इसमें दोष न कोय,
पंख मिले तो उड़ना उनका स्वाभाविक ही होय।
लेकिन कितनी दूर भी पहुँचे अपना लाल,
जड़ों से रिश्ता टूटना बन जाता है सवाल।
विदेश बुरा न कैरियर, न डॉलर अपराध,
दोष वहाँ जब आदमी भूले रिश्तों का स्वाद।
तरक्की की हर सीढ़ी पर इतना रखना ध्यान—
ऊपर चढ़ते-चढ़ते पीछे छूट न जाए इंसान।
तेरे डॉलर से भला, मेरा एक कलदार,
रूखी-सूखी में सुखी, अपना घर-संसार।
धन-दौलत सब जोड़िए, कीजै खूब विकास,
अपनों के हिस्से का मगर मत बेचो अवकाश।
कह ‘अनपढ़’ अंत में ख़ुद को समझाये,
धन बढ़े पर रिश्तों का आँचल न छूटने पाये।
— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X