प्यासा पथिक मैं युग-पथ का, पग-पग शूल बिछे पाए।
फिर भी मन में प्रेम-सुधा के, निर्मल निर्झर बहते जाएँ॥
अश्रु पिए निज मौन अधर ने, जग को मधु-मुस्कान दिया।
अपने उर का शोक छिपाकर, सबको नव सम्मान दिया॥
दग्ध धरा पर चलता आया, धूप बहुत सिर पर बरसी।
किन्तु किसी की आश न टूटे, यही प्रार्थना उर में हँसी॥
मेरा दुःख मेरा ही ठहरे, जग का दुःख मुझको दे दो।
यदि हो सके किसी के अधरों पर, हँसी का मधुवन दे दो॥
न माँगूँ वैभव के भूषण, न स्वर्णिम सिंहासन चाहूँ।
एक व्यथित उर को हँसा सकूँ, बस इतना वरदान ही चाहूँ॥
जीवन यदि मरुभूमि बने तो, मैं सावन बनकर बरसू।
सूखे मन के वन-उपवन में, नव आशा के सुमन सँवरूँ॥
अंतिम श्वास बहे जब मेरी, इतना जग इतिहास कहे—
"स्वयं प्यासा जीवन भर था, पर सबकी प्यास सदा ही बुझे।"
पीड़ा मेरी पूजा बन जाए, सेवा मेरा सम्मान रहे।
जब तक प्राण रहें इस तन में, मानवता ही भगवान रहे॥
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