मैं वह वट हूँ, जिसने अपनी
छाया स्वयं धूप में बोई है,
तुम्हारी राहों पर बिखराने
जीवन-भर हरियाली रोई है।
अपने अंतर की हर अभिलाषा
कालाग्नि में अर्पित कर दी,
तुम्हारे स्वप्नों की वेदी पर
अपनी प्रत्येक विभूति धर दी।
मेरे श्रम की प्रत्येक बूँद में
तुम्हारे कल का मधु घोला था,
मैंने अपनी संध्या खोकर
तुम्हारा स्वर्णिम प्रभात पिरोया था।
ईंट नहीं थीं वे दीवारें,
हर पत्थर में मेरा प्राण बसा;
उस आँगन की हर एक धूल में
ममता का निःशब्द विधान बसा।
यौवन केवल क्षणिक वसन्त है,
तन की मृगतृष्णा का उत्सव;
मन यदि प्रेम-सुधा से सींचा हो,
तभी सफल होता मानव-जीवन।
जब तुम चलना सीख रहे थे,
मैं गिर-गिर कर उठता जाता;
तुम्हारी प्रत्येक विजय के पीछे
अपना पराजय-गीत सुनाता।
आज तुम्हारे आकाश विशाल हैं,
मेरे क्षितिज हुए संकुचित;
किन्तु तुम्हारी ऊँची उड़ानों से
मेरे प्राण हुए दीप्त, पुलकित।
घर तब घर होता है बेटा,
जब उसमें अपने लौटें;
निर्जन दीवारें भी हँस उठतीं,
जब बच्चों के स्वर हों छोटे।
पोते की तोतली वाणी में
फिर जीवन का राग सुनाई दे;
सूखे पीपल की डाली पर
जैसे नव-पल्लव छाई दे।
दूर रहो तो भी स्मृतियों में
प्रतिदिन तुमसे मिल लेता हूँ;
रातों की निस्तब्ध प्रार्थना में
तुम्हें ईश्वर को सौंप देता हूँ।
तुम क्या जानो वृद्ध हृदय की
मौन व्यथा का नीरव भार;
अधरों पर मुस्कान सजी रहती,
भीतर बहता रहता ज्वार।
जीवन-रथ अब मंद हुआ है,
पर लगाम अभी भी हाथों में;
कर्तव्य-धर्म का दीप जला है,
शेष श्वास की बारातों में।
जब-जब तुम खिलके मुस्काते हो,
मैं फिर नव-पल्लव बन खिलता हूँ,
तुम्हारी हर नई उमंग में देखकर
अपने ही भविष्य से मिलता हूँ।
नव-संकल्पों के सागर में ,
निर्भय होकर आगे बढ़ना,
पिता का विश्वास साथ हो ,
तो किस बात से फिर डरना।
जीवन चाहे कैसी भी ,
कठिन परीक्षा लेकर आए,
धैर्य, श्रम और सत्य का
दीपक हर अँधियारा हर ले जाए।
गिरकर फिर उठना ही
जीवन का सबसे बड़ा विधान है,
साहस जिसके साथ खड़ा हो,
उसकी हर मंज़िल आसान है।
धन मिट जाएगा, यश ढल जाएगा,
काल सभी वैभव हर लेगा;
किन्तु पिता का निष्काम समर्पण
युग-युग तक संतति में जी लेगा।
नव उमंग से भरकर बेटा,
हर दिन नया विहान करना,
सत्य, श्रम और प्रेम के पथ पर ,
अपना जीवन दान करना।
विपदा आए तो मुस्काकर ,
उसका दृढ़ स्वागत करना,
जब तक पिता का आशीष मिले,
निर्भय होकर आगे बढ़ना।
मैं पिता हूँ—
हिमालय-सा मौन, समुद्र-सा हूॅ गम्भीर,
दीपक-सा निस्वार्थ, गंगा-सा मेरा अधीर।
स्वयं क्षीण होकर भी देता रहूगा उजियारा,
अरे तुम्ही हो मेरा जीवन, तुम सब मेरा सहारा।
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