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कर्म ही मेरा धर्म है

                
                                                         
                            मंदिर में मैंने पूछा—
                                                                 
                            
“भगवान, कहाँ मिलोगे?”
घंटी बोली धीरे से—
“जहाँ किसी की पीड़ा सुनोगे।”
मस्जिद ने भी यही कहा—
“पहले दिल को साफ़ करो,
सजदे में सिर झुकाने से पहले
किसी का दर्द माफ़ करो।”
गुरुद्वारे की देहरी बोली—
“सेवा यदि करनी है,
किसी भूखे की थाली में
अपनी रोटी धरनी है।”
एक माँ मंदिर की सीढ़ी पर
चुप बैठी थी, आँखें नम थीं,
मैंने पूछा—“क्या चाहती हो?”
बोली—
“बेटा, बस इतनी-सी करुणा,
जो आँखों में कम थी,
वही कर्मों में भरनी थी।”
उस दिन मैंने धर्म को
किताबों में नहीं पढ़ा,
एक माँ की आँखों में देखा,
और जीवन का सबसे गहरा
सच वहीं से सीखा—
धर्म नहीं वह जो माथे पर
चंदन बनकर सजता है,
धर्म वही जो संकट में
किसी के साथ खड़ा रहता है।
धर्म नहीं वह जो केवल
मंत्रों में दोहराया जाए,
धर्म वही जो भूखे के घर
एक निवाला बनकर जाए।
धर्म नहीं वह जो मंदिर में
दीप जलाकर लौट आए,
धर्म वही जो किसी के जीवन
का अँधियारा मिटा पाए।
हम भगवान को दूध चढ़ाएँ,
और बाहर भूखा बच्चा हो;
कैसा धर्म हमारा होगा
यदि मन में फिर भी अहंकार हो?
हम लाखों दीप जलाएँ,
पर किसी का घर अँधियारा हो—
कैसे कह दें पूजा पूरी,
जब पड़ोसी ही दुखियारा हो?
पूजा से पहले सेवा हो,
वाणी से पहले सच्चाई;
माथे से पहले मन झुके,
तभी धर्म में हो गहराई।
किसी पिता का काँपता हाथ
जब थामो, वह पूजा है;
माँ की आँख का आँसू पोंछो,
वही सच्ची आराधना है।
किसी अनाथ की मुस्कान में
जब अपना सुख मिल जाए,
किसी भूखे की थाली भरकर
मन भीतर से खिल जाए—
समझो उस क्षण मंदिर में
सौ दीपक जलते हैं,
जहाँ किसी के काम हम आएँ,
वहीं भगवान मिलते हैं।
मैं अब भगवान से
कुछ माँगूँगा नहीं,
बस इतना चाहूँगा—
जब कोई भूखा सामने आए,
मेरी थाली छोटी हो जाए;
जब कोई रोता हुआ मिले,
मेरी आँख भी नम हो जाए।
जब कोई राह में गिर जाए,
मेरे हाथ स्वयं बढ़ जाएँ;
जब कोई अन्याय सहता हो,
मेरे होंठ सच बोल जाएँ।
और जो मुझसे नफ़रत करता हो,
उसके लिए भी प्रेम रहे;
मेरे भीतर मनुष्य जीवित हो,
जब तक मेरी साँस रहे।
मेरी सेवा मेरी आरती,
मेरी करुणा मेरा प्रसाद;
मेरी सच्चाई मेरी पूजा,
मानवता मेरा विश्वास।
जब जीवन की संध्या आए,
और ईश्वर मुझसे पूछें—
“क्या लेकर आए हो?”
मैं सिर झुकाकर कह दूँगा—
“कुछ भी मेरा था ही नहीं,
न धन मेरा, न मान मेरा;
बस कुछ अवसर मिले थे मुझको,
बनने का इंसान मेरा।
कहीं किसी का हाथ थामा,
कहीं किसी के आँसू पोंछे;
कहीं किसी को क्षमा किया,
कहीं किसी के दुःख को समझे।
यदि प्रभु, यही मेरी पूजा,
तो मेरी पूजा स्वीकार करो;
मंदिर में कम खोजा तुमको,
मानव-हृदय में प्यार भरो।”
और तब शायद भगवान कहें—
“तूने धर्म नहीं बस माना,
तूने धर्म निभाया है;
तेरे छोटे-छोटे कर्मों ने
मेरा रूप दिखाया है।”
तब मैं मुस्काकर कह दूँ—
न जाति मेरी, न नाम बड़ा,
न कोई ऊँचा अभिमान मेरा;
बस इतना ही परिचय मेरा—
जहाँ किसी को मेरी ज़रूरत थी,
वहाँ मिला इंसान मेरा।
क्योंकि—
**धर्म मुझे ईश्वर तक ले जाए,
यह मेरी पहली चाह नहीं;
मेरे कारण कोई इंसान
ईश्वर से दूर न हो—
बस इतनी-सी राह सही।**
कर्म ही मेरी पूजा है,
कर्म ही मेरा मान है;
इंसान के काम जो आ जाए—
वही सच्चा इंसान है।
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2 महीने पहले

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