सिंहनाद कर, हे भारत! फिर अपने गौरव को पहचान,
अर्थ-समर का विजयी सेनानी—भारतीय स्टेट बैंक महान।
जब सूदखोरों के पंजों में जन-जीवन कराह रहा था,
श्रम का अर्जित स्वर्ण पसीना ब्याजों में ही बह रहा था।
तब विश्वासों की ज्योति जली, नवयुग ने उद्घोष किया,
बैंकिंग ने मानव को फिर से श्रम का सच्चा मोल दिया।
कलकत्ता से लेकर मद्रास, बॉम्बे तक इतिहास चला,
संघर्षों की तपती धरती पर वित्त-विकास का बीज फला।
फिर स्वतंत्रता के सूरज ने जब भारत का आकाश लिया,
स्टेट बैंक ने जन-जन के मन में विश्वास का प्रकाश दिया।
यह केवल इक बैंक नहीं है, भारत की धड़कन बनता है,
हर निर्धन की सूनी आँखों में आशा का दीपक जलता है।
हर किसान के खेतों में यह हरियाली बन लहराता है,
हर उद्योग के स्वर्णिम रथ का यह दृढ़ सारथी कहलाता है।
जन-धन हो या योनो सेवा, हर युग में यह आगे आया,
तकनीक और परिश्रम का अद्भुत संगम जग को दिखलाया।
भारत की आर्थिक शक्ति का यह सबसे ऊँचा ध्वजवाहक,
विश्व-पटल पर गूँज रहा है इसका यश अनुपम, अविनाशी।
गर्व मुझे है, मैं भी इसका कर्मनिष्ठ प्रहरी कहलाता हूँ,
सीमा पर सैनिक जैसे डटे, वैसे ही कर्तव्य निभाता हूँ।
स्याही की हर एक रेखा में राष्ट्रधर्म का मान लिए,
हर हस्ताक्षर में भारत के उज्ज्वल कल का गान लिए।
सेवा परमो धर्म अपनाकर अभी तो केवल आरंभ हुआ,
भारत के स्वर्णिम भविष्य का उद्घोषक यह ध्वजधार हुआ।
जब तक भारत विश्वशिखर पर गौरव से आसीन न होगा,
तब तक स्टेट बैंक का रथ भी विश्राम कभी न लेगा।
आओ, मिलकर शंख बजाएँ, नवयुग का उद्घोष करें,
भारत की आर्थिक स्वतंत्रता का हम सब जयघोष करें।
जय भारत! जय कर्म! जय श्रम! जय जन-जन का अभिमान!
जय-जय भारतीय स्टेट बैंक, राष्ट्रगौरव की अमर पहचान!
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