अ से अरमानों को पंख लगाता,खि से खिलते सपनों को सजाता,ल से लगन की राह पकड़कर,हर मुश्किल से आगे बढ़ जाता।
‘अखिल’—अर्थ है सम्पूर्ण,जिसमें सिमटा सारा संसार,
नाम में जैसे विश्व समाया,मन में वैसे प्रेम अपार।
अरमानों को पंख लगाकर,सपनों को देता आकार,
ठोकर खाकर फिर उठता है,चलता लेकर नया विचार।
धूप मिले तो छाँव बनाता,आँधी में बनता दीवार,
अपने हिस्से का दुःख सहकर,बाँटता सबको अपना प्यार।
अखिल नाम है उस मन का,जिसमें रिश्तों की दुनिया सारी,
अपनों की मुस्कान में जिसकी,बसती खुशियाँ सबसे प्यारी।
रिश्तों की वह डोर थामकर,हर रिश्ता निभाता है,
किसी की आँख नम हो जाए,तो खुद भी भर आता है।
पिता बने तो छाँव बने वह,भाई बने तो हाथ,
मित्र बने तो दर्द समझकर,बन जाए जीवन-साथ।
जीवन ने जब राह कठिन की,जब सपनों पर पहरा था,
टूटा था मन, थका था तन,फिर भी हौसला गहरा था।
वक्त ने कितने रंग दिखाए,कितने बदले लोग,
फिर भी मन में प्रेम बचाए,सहता हर संयोग।
विरासत में मिली कलम और मिला स्वाभिमान
दादा से मिली लेखनी की कला,शब्दों में संवेदना आई,
भावों को जब कागज़ सौंपा,मन की दुनिया मुस्कुराई।
दादा की कलम की वह विरासत,आज भी भीतर जीवित है,
शब्द भले ही उसके अपने हों,पर उनमें पुरखों की रीत है।
दादा से मिली लेखनी,शब्दों का सम्मान,
भावों को अभिव्यक्ति देना,बन गया उसकी पहचान।
पिता से पाया स्वाभिमान,सच के आगे शीश न झुकाना,
विपरीत हवाएँ कितनी हों,अपना पथ फिर भी न बदलाना।
पिता की दृढ़ता रक्त में लेकर,सीखा उसने मान,
झुकना केवल प्रेम के आगे,नहीं बेचना स्वाभिमान।
पिता से मिला स्वाभिमान,सच से मिला प्रकाश,
दादा की कलम और पिता की दृढ़ता—
यही उसकी विरासत खास।
कर्म की पहचान कर्मभूमि में विधि का प्रहरी,
न्याय-पथ का रखवाला,कानून की भाषा में लिखता,
सच का उजला उजियाला।कर्म से विधि अधिकारी है,
कर्तव्य जिसका मान,न्याय, नीति और सत्य के आगे,
झुकता नहीं स्वाभिमान।
पर जब दफ्तर की सीमाएँ छूटें,और मन अपना बोल उठे,
कागज़ पर संवेदनाएँ उतरें,शब्दों में एहसास घुलें।
लेखनी की पहचान तब लेखनी कवि बन जाती,
शब्दों में संसार सजाती, दर्द मिले तो गीत बना दे,
खुशियाँ मिले तो दीप जलाती।कभी कलम से दर्द लिखे वह,
कभी प्रेम की बात, कभी समाज को आईना दे,
कभी रिश्तों की सौगात। कानून की कठोर धार से,
कविता की कोमल छाँव,एक ही मन में साथ बसे हैं—
न्याय और भाव की ठाँव,दादा की कलम से मिली विरासत,
पिता से मिला स्वाभिमान, कर्मों ने दोनों को सँवारा,
बना दिया जीवन की पहचान।
न पद का मद, न धन का गर्व, कर्मों पर विश्वास रहा,
सच की राह कठिन थी फिर भी,सच ही उसका प्रकाश रहा।
जो मिला उसे प्रेम दिया और, जो छूटा उसको जाने दिया,
बीते कल की राख से उठकर, आज नया अफसाना किया।
अखिल केवल नाम नहीं है,एक सोच, एक विश्वास,
कर्म में न्याय, कलम में कविता,हृदय में अपना-सा एहसास।
‘अखिल’ का अर्थ सम्पूर्ण है, तो जीवन भी पूर्ण बने,
अपने सुख से आगे बढ़कर,दूजों के जीवन में फूल खिले।
जिससे मिले उसे अपनापन,जिसके मिले उसे सम्मान,
और जहाँ अँधेरा दिख जाए,वहाँ बन जाए दीप समान।
कल की चिंता किसने देखी, आज को सँवारना है,
अपने कर्मों की खुशबू से ही,जीवन को महकाना है।
जब जीवन की साँझ उतरकर,धीरे-धीरे आएगी,
दुनिया पीछे छूट जाएगी, बस यादें साथ निभाएँगी।
तब न पद होगा, न धन होगा,न कोई ऊँचा नाम,
बस इतना ही पूछा जाएगा—“कितनों के आया काम?”
यदि किसी दुखी चेहरे पर,एक मुस्कान खिला पाया,
यदि किसी अकेले मन को,दो पल अपना बना पाया,
यदि किसी के अँधियारे में,छोटा दीप जला पाया—
तो समझो इस जीवन में,अखिल ने जीवन जी पाया।
दादा की कलम का वारिस,पिता के स्वाभिमान की शान,
कर्म से विधि का प्रहरी रहे,लेखनी से कवि महान।
नाम ‘अखिल’ हो सार्थक उसका,ऊँचा हो उसका इंसान,
जिसके कर्मों से महके दुनिया,जिससे बढ़े कुल का मान।
नाम रहे तो अर्थ रहे,अर्थ रहे तो प्यार,
अखिल—जिसमें समाया हो,अपनों का संसार।
और जब आखिरी पन्ना जीवन का,धीरे-धीरे बंद हो जाए,
नाम नहीं—बस कर्मों की खुशबू,पीछे-पीछे रह जाए।
इतनी-सी पहचान रहे,इतना-सा अरमान—
“अखिल गया तो क्या हुआ, दिलों में जीवित रहे इंसान।”
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