मत समझो भारत केवल, शांति-मंत्र का गायक है; जब अन्याय प्रचंड हो उठे, यह कालजयी नायक है।
जिसने बुद्ध का दीप जलाया, वही सुदर्शन भी धारेगा; जो प्रेम-पुष्प लेकर आए, उस पर अमृत बरसाएगा, पर जो आँख उठाएगा— उसका अभिमान उतारेगा।
अब सीमा केवल रेखा नहीं, हर शिखर प्रलय का द्वार हुआ; भारत का हर वीर सिपाही, दुर्गा का साक्षात् अवतार हुआ।
हिमालय का हर पत्थर अब रणघोषों से गूँज रहा, सागर का हर ज्वार तिरंगे की जय-ध्वनि बनकर गूँज रहा।
नभ में उड़ता तेजस बोले— "अब भारत आत्मनिर्भर है!" ब्रह्मोस की गर्जन कहती— "हर संकट का उत्तर है!"
अग्नि की ज्वाला में तपकर संकल्प हमारा ढलता है, दुश्मन की हर कुटिल दृष्टि का उत्तर भारत बनता है।
हम युद्धों के भूखे कब थे, हमने जग को प्रेम दिया; किन्तु जब-जब सिंह ललकारा, सिंहासन तक हिला दिया।
हमने शांति का पाठ पढ़ाया, पर कमजोरी नहीं दिखाई; अब हर सीमा, हर चौकी पर भारत ने हुंकार सुनाई।
स्वदेशी शस्त्र, स्वदेशी विज्ञान, स्वदेशी शक्ति का नव अभियान; विश्वगुरु का स्वप्न लिए अब बढ़ता मेरा हिन्दुस्तान।
सैनिक केवल वर्दी नहीं, वह जन-जन की साँस है; उसकी आँखों में बसता माँ भारत का विश्वास है।
जिस दिन रणभेरी बजती है, घर-घर दीपक जलते हैं; वीरों के त्याग के कारण ही हम निर्भय होकर चलते हैं।
आओ ऐसा प्रण दोहराएँ— राष्ट्र रहेगा सबसे महान; जब तक गंगा बहती होगी, अमर रहेगा हिन्दुस्तान।
जिसकी मुट्ठी में वज्र समाया, जिसकी वाणी में वेदों का सार; वही भारत आज विश्व से कहता— "शांति हमारा धर्म है, पर विजय हमारा अधिकार!"
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