छुट्टी
छुट्टी सिर्फ़ छुट्टी नहीं होती,
छुट्टी सिर्फ़ कैलेंडर का ख़ाली खाना नहीं,
बल्कि अपनों के नाम छूटा हुआ वक़्त होती है।
किसी की उधार रही हँसी का क़र्ज़ चुकाने का दिन,
किसी के पास जाकर उसके हिस्से के थोड़े-से आँसू
अपनी आँखों में भर लेने का वक़्त।
किसी प्रतीक्षा को पूर्ण विराम देने का पल,
किसी के चेहरे पर तिल बन जाने का क्षण,
ताकि जब वह आईना देखे,
तो उसमें मैं भी दिखाई दूँ।
अपनी अनुपस्थिति का बहीखाता ठीक करना होता है,
जिसमें ख़ुद पर ही सबसे ज़्यादा क़र्ज़ चढ़ा हो।
यह उस इंतज़ार करती ज़िंदगी का हिस्सा है,
जिसे हम अपनों के साथ
और कभी ख़ुद के साथ जीना चाहते हैं।
कभी नदी के पास बैठकर
अपने भीतर की गंदगी बहानी थी,
कभी समंदर से पूछना था—
लौटकर जाने वाली लहरें
किनारों को भूल जाती हैं क्या?
किसी बाग़ में अकेले बेंच पर बैठकर
किसी पेड़ से पूछना था—
तुम्हें भी अपना स्थान बदलना है क्या?
लेकिन रोज़मर्रा के कामों,
दफ़्तर की भाग-दौड़ और ज़िम्मेदारियों के बीच
हम बस ख़र्च हो रहे हैं,
एक मशीन की तरह घिस रहे हैं।
अपने भीतर बस कचरा भर रहे हैं,
और क़र्ज़ बढ़ा रहे हैं अनुपस्थिति का...
और एक दिन
हम पूरी तरह ख़र्च हो जाएँगे,
पूरी तरह घिस जाएँगे।
हम विस्थापित हो जाएँगे,
और हमारी कमी उतनी ही देर महसूस होगी,
जितनी देर मेज़ से हटाई गई कुर्सी की
ख़ाली जगह रहती है।
हमारी कमी उतनी ही देर रहेगी,
जितनी देर चाय के कप के नीचे
गीला, गोल निशान रहता है।
फिर मेज़ पोंछ दी जाएगी।
आख़िर में हमारे हिस्से आएगा
एक थका-हारा, जीर्ण शरीर,
उखड़ती साँसें
और एक अधूरा-सा अफ़सोस।
काश!
ऐ नौकरी,
मैंने तुझे अपनी ज़िंदगी के कुछ हिस्से दिए हैं,
तू मेरी ज़िंदगी की मालिक बनकर
मेरे पूरे वक़्त की मालिक मत बन।
तू मेरी ज़िंदगी की किरायेदार थी,
मेरी साँसों की मालिक नहीं,
कि मुझे अपनी ही ज़िंदगी जीने के लिए
अपनी ही ज़िंदगी के वक़्त में से
तुझसे चंद लम्हों की मोहलत माँगनी पड़े।
क्योंकि जिस दिन
मेरी साँसों की आख़िरी पगार मिलेगी,
उस दिन तेरे खाते में
मेरी उम्र का पूरा हिसाब होगा,
मगर मेरे अपने
मेरे साथ बिताए वक़्त की
एक अधूरी-सी रसीद लिए खड़े होंगे।
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