मेरी आँखें ताउम्र उसकी राहें निहारती रही
मेरे पास कभी इंतजार ए शख्स नहीं पहुंचा
दिल की बात जो उसके हक में लिखी थी
वो खत जो कभी सही पते पर नहीं पहुंचा
एक दिन यूं ही घर से निकल आया मै
मुड़कर फिर कभी अपने घर नहीं पहुंचा
कितना आसाँ था मेरे तक आ जाना
कदम बढ़ाए उसने मगर कभी दिल तक नहीं पहुंचा
जो मिला उसे मैने अपना मान लिया
मागने की ख़ातिर कभी खुदा के दर नहीं पहुंचा
याद आती है मां की रोटिया रात में
निवाला मुंह तक गया मगर कभी पेट तक नहीं पहुंचा
गाँव से निकल आया था मैं बचपन में ही
मैं तो लौट आया मगर कभी बचपन नहीं पहुंचा
गौर किया तो समझ में आया गौतम
जिंदगी में कुछ भी कभी सही जगह नहीं पहुंचा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X