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नारी शक्ति

                
                                                         
                            नारी हूँ, शत-शत पर भारी हूँ,
                                                                 
                            
शक्ति-स्रोत का विस्तार हूँ।
मत आँको मेरे सामर्थ्य को,
मैं स्वयं सृष्टि का आधार हूँ।
मेरे आँचल में करुणा बसती,
नयनों में स्वर्णिम स्वप्न सजे।
त्याग, तपस्या और समर्पण से,
जीवन के हर दीप जले।
मैंने हर संग्राम सहा है,
हर प्रचंड तूफ़ान से भिड़ी हूँ।
गिरकर फिर से उठ खड़ी हुई,
मैं अदम्य साहस की कड़ी हूँ।
मत समझो मुझको निर्बल तुम,
मैं चंडी का साकार रूप हूँ।
जहाँ अन्याय मस्तक उठाए,
वहाँ न्याय का महाघोष हूँ।
मेरे संकल्पों की ज्वाला से,
तम के दुर्ग ध्वस्त हो जाते।
जो पथ में अवरोध बनें,
वे स्वयं मार्ग बदल जाते।
मेरी हुंकार से पर्वत काँपे,
मेरे संकल्प से सागर झुके।
मेरी अटल इच्छाशक्ति के आगे,
भाग्य के लेख भी बदल चुके।
रोक सको तो रोक लो मुझको,
मैं रुकने वाली धार नहीं।
अग्निपथों पर चलने वाली,
मैं कोई क्षीण विचार नहीं।
मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ,
मैं युग-परिवर्तन की तैयारी हूँ।
शत-शत बाधाएँ क्या रोकेंगी,
मैं नारी हूँ, सौ पर भारी हूँ।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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