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त्योहार अब भी आते हैं

                
                                                         
                            त्योहार आज भी उसी शिद्दत से दस्तक देते हैं,
                                                                 
                            
मगर अब घर के आँगन पहले-सी रौनक़ कहाँ समेटते हैं।

किसी बेटी की रुख़्सती ने चौखट वीरान कर दी,
किसी बेटे की जीविका ने घर से दूरी तय कर दी।

जिन किलकारियों से कभी दीवारें गूँज उठती थीं,
आज उन्हीं की प्रतीक्षाएँ घर की ख़ामोशी बुनती हैं।

माँ आज भी पकवानों में वही स्वाद सजाती है,
मगर हर थाली किसी अनुपस्थित चेहरे को बुलाती है।

वक़्त ने जाने कैसी ये तदबीर रचाई है,
त्योहार तो लौटे, मगर अपनों की दूरी साथ लाए
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4 घंटे पहले

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