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अच्छे दिन के नज़ारे

                
                                                         
                            गरीब रो रहे हैं हंसते सामन्त सारे,
                                                                 
                            
लगता है आ गये हैं अच्छे दिन के नज़ारे।
बह रही हवायें उल्टी बह रही धाराएँ,
लगता है आ गये हैं, अच्छे दिन के नज़ारे।

मज़लूमों के ऑंसू न पोछते हैं कोई,
पोछना जो चाहे वही हो जाते द्रोही।
चल रहा है शासन सब जुमले के सहारे,
लगता है आ गये हैं, अच्छे दिन के नज़ारे।

महंगाई देखो कैसे तारों को छू रही है,
त्रस्त सारी जनता घुट-घुट के जी रही है।
भाषण में नित्य फोड़े विकास के गुब्बारे,
लगता है आ गये हैं, अच्छे दिन के नज़ारे।

धर्म में उलझे हैं जात-पात में बंटे हैं,
इंसानियत का दुश्मन बन फर्ज से हटे हैं।
बुझते जा रहे हैं, सब सत्य के दीया रे,
लगता है आ गये हैं, अच्छे दिन के नज़ारे।

भविष्य को कुचल कुछेक खा रहे मलाई,
नौनिहाल भी सड़क पे लड़ रहे लड़ाई।
माँगें हक़ तो मिलती गन पैलेट की बौछारें,
लगता है आ गये हैं, अच्छे दिन के नज़ारे।

राजा सा व्यवहार लोकतंत्र में उचित नहीं,
खामोश ये तूफान है क्या ये तुम्हे सूचित नहीं।
जीद्द पे जो आ जाये पल में करे किनारे,
लगता है आ गये हैं, अच्छे दिन के नज़ारे।
-अजीत कुमार
 
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एक घंटा पहले

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