कुछ नहीं रहता सदा बाकी वही होकर पड़ा,
थी कहीं बंजर जमी जो आज है पर्वत खड़ा,
वो महज बूंद थी जो आज जा समुंदर बनी,
एक सूखा था वो जंगल आज फूलों से भरी,
गुमान में धन के जो थे मोहताज कौड़ी के हुआ,
जिसको लगता था वो सुबह है उड़ गए बनकर धुआं,
कुछ नहीं रहता सदा बाकी वही होकर पड़ा,
उम्र की दहलीज से जो पार होते जा रहे थे,
एक उम्र में वो स्वयं को सम्राट जो बता रहे थे,
फूल सुंदर था कभी जो मुरझाकर जब आ गिरा,
इतिहास ने पूजा उसे जिसको कहा था सरफिरा,
थी कहीं चमचम हवेली बाढ़ में जो ढह गयी,
याद करने को महज जलती चिताएं रह गई,
साथ थे तो कोसने में ही गया जब रात दिन,
मूँद ली जब आंख कैसे धार इतनी बह गई,
मन की बाते थी रही मन में ही संचित कहीं,
धड़कने जिंदा रही पर भाव से वंचित रही,
आदमी जब था चला इस धरा को छोड़कर,
तब सभी पैदा हुए थे उससे नाता जोड़कर,
कुछ नहीं रहता सदा सक्षम किसी भी मोड़ पर,
सब यही रहता पड़ा अंतिम लहर की छोर पर,
चट्टान रहता है खड़ा नदियाँ निकलती जाती है,
किरदार बदलते जीवन के सदियाँ निकलती जाती है,
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