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ज़िंदगी की कसौटी

                
                                                         
                            हर कोई ज़िंदगी की कसौटी पर
                                                                 
                            
खरा उतर नहीं पाता।

हर कोई बिखरी हुई ज़िंदगी को
वक़्त रहते समेट नहीं पाता।

बड़ी कशमकश है
ज़िंदगी का हर एक लतीफ़ा,
हर कोई इसे सह नहीं पाता।

दूसरों की मुस्कानों के पीछे
छिपे दर्द को समझ नहीं पाता।

दूसरों की खुशियाँ देखकर
अपने ही ग़मों में उलझ जाता,

और अपने फटे दामन को भी
ठीक से सी नहीं पाता।

जो कुछ उसके पास है,
उसकी क़दर नहीं कर पाता।

जो कुछ दूसरों के पास है,
उसी को देखकर ख़ुद को
संतुष्ट नहीं कर पाता।

"तुलना की आग में सुलगकर,
सुकून की ज़िंदगी जी नहीं पाता।"

अपने भीतर छिपे अनमोल
ख़ज़ाने को भी पहचान नहीं पाता।

यही है ज़िंदगी की सबसे बड़ी विडंबना,
इंसान ख़ुद को पाकर भी
ख़ुद को पा नहीं पाता।

 
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2 महीने पहले

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