जानता हूँ, विरह की अग्नि में
तुम भी हर पल जलती होगी।
मैं भी हर कदम फूँक-फूँक कर चला हूँ,
हर रात तड़पकर ढलती होगी।
समय ने कैसी रेखा खींच दी,
हम दोनों के जीवन के बीच।
जवानी आई, और बिछड़ गए हम,
कैसी यह भाग्य की कठोर रीत।
फिर भी मेरे अंतर में आज भी
तेरे प्रेम का दीपक जलता है।
तूने जो गीत कभी गुनगुनाया था,
वही आज भी मेरे मन में पलता है।
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