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ख़ामोशी की उस हर लहर का

                
                                                         
                            तू फ़िक्र न कर,
                                                                 
                            
तू बेफ़िक्र रह,
ये सब इल्ज़ाम तो मुझे ही झेलना है।

तू ज़िंदगी के हर लम्हे
ख़ुशियों को माहौल में बोता रह,
विरह की अग्नि में तो बस
मुझे ही तपना है।

करवटें चाहे कितनी बार भी ले ज़िंदगी,
क्या फ़र्क़ पड़ता है?
हर साँस में मेरा ही तो दिल धड़कता है।

तू हर सितम से दूर रह,
हर सितम का सामना तो
मुझे ही करना है।

ख़ामोशी की उस हर लहर का
आभास है मुझे,
तू यूँ ही ख़ामोश रहा कर,
हर ख़ामोशी का जवाब
मुझे हँसकर ही देना है।
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9 घंटे पहले

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