क्या हूँ मैं,
जो ख़ुद पर इतराऊँ?
कुछ भी तो नहीं है मेरा,
जिस पर मैं अपना धाक जमाऊँ।
जो भी है, वह सब यहीं तक सीमित है,
कुछ भी ऐसा नहीं,
जिसे मैं हमेशा के लिए
अपने साथ रख पाऊँ।
फिर क्यों इतना समेटूँ,
जिसे मैं अपने साथ
ले ही न जा पाऊँ।
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