कई मौसम बीत गए…
कई सप्ताह बीत गए…
कई महीने बीत गए…
कई साल बीत गए…
और न जाने
कितनी सदियाँ भी बीत गईं।
लेकिन…
तुमने इस दौरान
एक दफ़ा भी यह जानना उचित न समझा
कि मेरा हाल कैसा है।
मेरा हाल…
अब बेहाल होने लगा है।
यह दिल…
तेरा इंतज़ार करते-करते
अब थकने लगा है।
ये आँखें…
तेरी राह तकते-तकते
अब धुँधलाने लगी हैं|
उम्मीद की जो
एक छोटी-सी किरण थी,
वह भी…
इस लंबे इंतज़ार के सफ़र में
धीरे-धीरे
मंद पड़ने लगी है।
फिर भी…
मैं आज भी
उसी मोड़ पर खड़ी हूँ,
इस उम्मीद में…
कि शायद आज नहीं,
तो कल…
तुम लौट आओगे।
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