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तुम्हारे उस "वादे" के सच होने का इंतज़ार है।

                
                                                         
                            अगर आना नहीं था…
                                                                 
                            
तो मेरे दिल में
अपने लिए जगह क्यों दी?

अगर लौटना नहीं था…
तो साथ निभाने का
वादा क्यों किया?

अगर मेरा होना
तेरी ज़िंदगी में ज़रूरी नहीं था…
तो मेरी ज़िंदगी में
अपनी मौजूदगी का एहसास क्यों दिया?

तुमने ही तो कहा था—
"यहीं मेरा इंतज़ार करना…
मैं लौटूँगा…
और तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा।"

मैंने…
तुम्हारे हर शब्द को
अपनी तक़दीर समझ लिया।

आज भी…
मैं उसी मोड़ पर खड़ी हूँ…
फ़र्क़ बस इतना है कि…
पहले मुझे
तुम्हारे लौट आने का इंतज़ार था,
और अब…
तुम्हारे उस "वादे" के सच होने का इंतज़ार है।

कहते हैं…
इंतज़ार की भी
एक उम्र होती है।

मगर…
मोहब्बत उम्र नहीं देखती,
वह तो आख़िरी साँस तक…
अपने "वादे" पर ज़िंदा रहती है।

और यदि…
कभी लौटो…
तो मुझे ढूँढ़ना मत…
मैं कहीं और नहीं मिलूँगी।

मैं आज भी…
उसी मोड़ पर खड़ी मिलूँगी…
जहाँ तुमने जाते-जाते कहा था—
"मेरा इंतज़ार करना…
मैं लौटकर ज़रूर आऊँगा।"
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2 महीने पहले

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