एक आत्ममंथन करती कविता
ज़िंदगी न जाने कितनी बार,
खुशियों का सौगात लेकर आई,
मेरे दिल रूपी दरवाज़े पर,
न जाने कितनी बार दस्तक लगाई।
हर बार नई उम्मीद जगाई,
हर बार नया उजाला लाई,
मेरी सूनी दुनिया को महकाने,
हर बार एक नई बहार आई।
मगर अफ़सोस! मैंने उसकी पुकार सुनी,
फिर भी अपनी ख़ामोशी नहीं तोड़ी,
उसने दिल के दरवाज़े खटखटाए,
मैंने हर बार उम्मीदें उसकी छोड़ी।
न एक बार भीतर से जवाब दिया,
न आने का कोई पैग़ाम दिया,
अपनी ही धुन में इतना मग़रूर रहा,
खुशियों को ठुकराकर ख़ुद को ही दूर किया।
मुझे लगा, अभी तो बहुत वक़्त है,
खुशियों से मिलने के हज़ारों अवसर हैं,
आज नहीं तो कल मिल ही जाएँगी,
ज़िंदगी में अभी अनगिनत सफ़र हैं।
लेकिन ऐ मेरे यार! वक़्त कहाँ ठहरता है,
जो आज अपना है, कल बिछड़ता है,
हर अवसर बार-बार नहीं आता,
हर खोया लम्हा लौटकर नहीं आता।
आज जब ख़ामोशी दिल में उतर आई है,
जब बीती हुई घड़ियाँ याद बनकर सताती हैं,
तब मन में एक सवाल उठता है,
क्या खुशियाँ अब भी मेरा दरवाज़ा खटखटाती हैं?क्या अब भी कोई आख़िरी दस्तक बाकी है,
क्या मेरी ख़ुशियों की कोई राह अभी बाक़ी है?
क्या कोई पुकार मुझे फिर से बुलाएगी,
क्या ज़िंदगी एक और अवसर दे पाएगी?
ऐ मेरे यार! अगर वह दस्तक अब भी आए,
तो मेरा दिल उसे अनसुना न कर पाए,
मैं अपने सारे भ्रम और अभिमान छोड़ दूँ,
खुशियों के लिए दिल के सारे द्वार खोल दूँ।
अब समझ आया है, जीवन का सार यही है,
हर पल को जी लेना ही सच्चा उपहार यही है,
खुशियाँ हमेशा दरवाज़े पर नहीं आतीं,
और हर ठुकराई दस्तक लौटकर नहीं आती।
जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है,
जब खुशियाँ पास होती हैं, हम उनका मूल्य नहीं जानते,
और जब वे विदा हो जाती हैं,
तब हम उम्र भर एक आख़िरी दस्तक की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं।
— अजयकुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X