किसने किसके आंसू देखे कौन किसका ग़म जिया
हम सिसकते रह गए और ज़माना हंस दिया।
मुस्कुरा के जीया था, मैं जो चार पल
उस ख़ुशी ने मुझको बेबस कर दिया।
मंज़िल मेरी कुछ भी नहीं, फिर भी है कुछ
नाम जिसके मैंने सब कुछ लिख दिया।
ज़िंदगी से वाक़िफ़ मैं अपनी कब ना था
अनजान मेरा नाम क्यूँ कर रख दिया
तारीफ़ के क़ाबिल नहीं हो, ऐ अश्क़ तुम
तनहा दिलों का फिर भी है तुमने संग दिया।
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